करोगे क्या ?


करोगे क्या ?
अगर कहूं की उदास हूं मैं।
हर एक हर्फ को अल्फ़ाज़ बना पाओगे ?
ये जो फुरकत के पल दिए हैं
उनमें कुरबत को सींच पाओगे ?
वो जो लब्ज़ मुस्कान बनते हैं
उन्हें मुझ तक खींच पाओगे ?
नहीं!!
तो करोगे क्या?
अगर कहूं की उदास हूं मैं।
मुख्तसर ज़िन्दगी के रहनुमा बन पाओगे ?
कमबख्त बड़ी मुश्किल से चराए
सुकून के फकत दो पल
अपने नूर की आंच में
वहां गुलज़ार बना पाओगे ?
नहीं ।
तो करोगे क्या?
अगर कहूं की उदास हूं मैं।

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