डर लगता है मां


आज भी डर लगता है,
वापिस तेरी कोख में आने से।

डर लगता है उन दरिंदों की निगाहों से,
जो तुझे औरत नही समझते...
जो मुझे अपना अंश नही समझते।

ख़ामोश रह के सिसकती है तू,
बोल ना मां क्यूं डरती है तू।

उठ लड़ उनसे मेरी खातिर,
क्या तू भी मुझको पराया है समझती???

क्यूं बेटों को ही तेरे आंचल की छाव मिले,
क्यूं ना तेरी बगिया मे बेटी जैसे फूल भी खिले।

आखिर क्या है जो बेटा देता है,
तुम्हें वृद्धाश्रम में भी तो वहीं छोड़ता है।

आज हर मुकाम पर बेटियां कामयाब हैं,
बहुत हुआ मां क्यूं अब पहना नक़ाब है।

सुन मेरी बात, कुछ तो कह,
ऐसे ना चुपचाप अन्याय तू सह।

फ़िर क्यूं बिलखती है तू मेरे लिए,
इसीलिए डर लगता है...
वापिस तेरी कोख में आने से।

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