अपनों के लिए


हर सपना था टूट रहा
हिम्मत भी छुट रही
कहाँ था जाना
कहा थी जा रही
ना जाने कैसा ये मोड़ था
जीदगीं का मेरा
रास्ता भी साफ था
पर थी बहुत रूकावटे
कि थी बहुत कोशिश
उसे पाने की ; पर हर कोशिश नाकाम थी हो रही
देखें थे बहुत सपने ; एक एक कर सब टूट रहें
ना हिमम्त थी इतनी
कि जोड़ लू उनहें ; बस चल रही थी
सासों के साथ
कि हैं बहुत कोशिश खुद को बदलने कि
पर ना बदल पाई खुद को
जो कहा वो सब गलत लगा
इसलिए वक़्त के साथ चूप , रहना भी सिख लिया
जो कहा वो सब करने लगी ,अपने लिए नहीं
अपनों के लिए जिने लगीं
हर खवाब अपने भुलाने लगीं
अपना बनाने की कोशिश करने लगीं
अपना रास्ता छोड़, उनके कहें रास्ते पर चलने लगी
छोटे बड़े सब कि मैं सुनने लगीं
खुद को गलत❌ सही उनहे बताने लगी
अपने लिए नहीं अपनों के लिए अब मैं जीने लगी

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