आखिर मैं कौन हूँ


इस कविता में रूह अपनी मौजूदगी के बारे में बता रही है। कि हमारी जो रूह है, जो आत्मा है वो कितना विशाल है। जो भी है हम में वो यही है इसका बिना तो शरीर भी मृत है। नीचे पढ़े मेरी कविता-

आखिर मैं कौन हूँ।

मैं किसीका अक्ष हूँ
मैं किसी का अंश हूँ
किसी की दर्द हूँ या
खुशी का एहसास हूँ
आखिर मैं कौन हूँ।

जो डर है तुझमें
या तेरी जो हिम्मत है
या फिर किसी श्मशान में
फैला वो सन्नाटा हूँ
आखिर मैं कौन हूँ।

बच्चे की किलकारी हूँ
या तंग गलियों की मारा-मारी हूँ
भीड़ में कहीं गुमनाम सी
या कोई बंगला आलीशान हूँ
आखिर मैं कौन हूँ।

वो चांदनी रात की याद हूँ
या तन्हाइयो की बारात हूँ
सूरज की तेज हूँ
या चन्द्रमा का शान हूँ
आखिर मैं कौन हूँ।

मैं गंगा की चंचल धारा हूँ
या आसमान का ध्रुव तारा हूँ
नीलकंठ का विष हूँ
या समुद्र मंथन में निकला अमृत हूँ
आखिर मैं कौन हूँ।

मैं हिमालय सी महान हूँ
या किसी की कायरता का प्रमाण हूँ
मैं उस गरीब की कुटिया हूँ
या प्रलय की आंधी हूँ
आखिर मैं कौन हूँ।

मैं संगम सा पवित्र हूँ
या किसी औरत का चरित्र हूँ
मैं गुलाब सी सुंदर हूँ
या किसी का अस्तित्व हूँ
आखिर मैं कौन हूँ।

गोधुली की बेला हूँ
या बच्चों के दिल को बहलाने वाली मेला हूँ
मैं क्या किसी की हयात हूँ
या खुद में ही पूरी कायनात हूँ
आखिर मैं कौन हूँ।

किसी के लिए सफर की मुसाफिर हूँ
या किसी के लिए काफ़िर हूँ
जो रोज ढल जाए वो दिन हूँ
या हर रात के बाद जो खिले वो आदित्य हूँ।
आखिर मैं कौन हूँ।

रात रानी की खुश्बू हूँ
या कमल की कीचड़ हूँ
मैं हवन कुंड की अग्नि हूँ
या बारिश का पानी हूँ
आखिर मैं कौन हूँ।

मैं तुझमे भी हूँ , मैं उसमे भी हूँ
तेरा डर भी और तेरा क्रोध भी हूँ
मैं ही शंकर, मैं ही सती
मैं ही वो बहती नदी
राम की सीता मैं
कृष्ण की गीता मैं
मैं तेरी बुराई हूँ और तेरी अच्छाई हूँ
तेरी रूह हूँ और तेरी परछाई हूँ
मैं शून्य हूँ मैं संसार हूँ
मैं तुम हूँ, मैं तुझमे हूँ, उतना ही जितना सब में हूँ।

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