आजाद हूं मैं


आजाद हूं मैं गिरती हुई सोच के बंधन से आजाद हूं मैं,
झूठे अल्फाजों को सच जताने से आजाद हूं मैं।

खुले विचारों का तो यार हूं मैं
पर झूठे अदाओं के दिखावे से आजाद हूं मैं।

अपनी आंखों को रखता हूं रूह की कैद में
जिस्म की बातों से आजाद हूं मैं।

करता हूं मैं भी खुदा की इबादत
पर झूठी शराफत के दिखावे से आजाद हूं मै।

ऐ कातिल देना होगा तुझे अपनी एक एक जुर्रत का हिसाब
मैं तो रूह हूं ,अब तेरे जिस्म से आजाद हूं मैं।

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