आत्मज्ञान


दिन भी गुज़र दी रात के इंतजार में,
कभी कभी बहुत अजीब लगता है इस अपने से संसार में।

जब पड़ा होता हूं एकांत में,
मन विचारो से सराबोर होता है,
अनेकों सवाल उमड़ रहे होते है,जवाब के इंतजार में,
रह रह के लगता है सब कुछ मतलब से होता है इस संसार में,

कुछ अंदाज़ नए होते है,
कुछ यादें पुरानी,
जिंदगी कुछ सीख दे जाती है,
खुद की जुबानी....

सही कौन है, गलत कौन,
असमंजस में पड़ जाता हूं,
दिमाग राग छेड़ जाता है,
उसे मन लगातार गुनगुनाता है।

'मिंकु' गलत क्या है सही क्या,
बस यही वक़्त बताता है,
संसार के हिसाब से यही आत्मज्ञान कहलाता है,
यही आत्मज्ञान कहलाता है......

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