इत्तिफ़ाक !!!


इत्तिफ़ाक !!!

ज़ि हाँ, इत्तिफ़ाक !
इत्तिफ़ाक हुआ मुझ संग!
और, 'इत्तिफ़ाक' से मोहब्बत है मुझे !!!

कयोंकि, इस 'इत्तिफ़ाक' में;
मिठास है,
खरा-पन है,
नमकीन दौर भी हैं...
कभी लगता छल है...
शायद कडवाहट भी हैं...
और, 'इत्तिफ़ाक' जैसे अपने आप में अलग-सा बदलाव ला रहा हों मुझे में...

फिर, कभी लगता कहीं बहोत अपना-पन मिल रहा हैं...बहोत स्नेह मिल रहा हैं...
बहोत-से ज़बात जुड़े रहे हैं...
जिसका अलग-सा मिज़ाज हों...
जान-लिया और महसूस भी किया मैंने,
'इत्तिफ़ाक', इत्तिफ़ाक नहीं होता जनाब !
बल्कि, बहोत ही खास होता है...
लेकिन कभी-कभी 'इत्तिफ़ाक', इत्तिफ़ाक बनकर रह जाता तो सब कुछ खाली-सा लगता है...और न्...
जब पुरा अपना बनकर रहता तो सब-कुछ बेहद खुबसूरत और खुसी कि महक से भरा बहोत प्यारा लगता है...

और, चाह इतनी- सी कि 'इत्तिफ़ाक' मुझसे कहें;
में 'इत्तिफ़ाक' नहीं;
बल्कि, अपना बनकर रहूँगा...

ज़ि हाँ, इत्तिफ़ाक !
इत्तिफ़ाक हुआ मुझ संग!
और, 'इत्तिफ़ाक' से मोहब्बत है मुझे !!!

- पुजा साखरे ।

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