एक अँधेरा और उसमें \


हम हार कैसे मान सकतें हैं??
ख़ुद के ख़िलाफ बातें सुनकर!!!
हम हार कैसे मान सकतें हैं??
ज़िंदगी के मुश्किल हालातों से जो सभी की ज़िंदगी में होते हैं!!!
हम टूट कैसे सकतें हैं??
कोशिश करनी हैं हमें उन बिखरे टुकड़ों को समेटने की,
ख़ुद को समेटने की,
जो हमें अपनी जिम्मेदारी समझने और निभाने से हैं।
जो हमें अपनी नकारात्मकता को सकारात्मक से बदलने से हैं।
नहीं हार मान सकतें हैं हम!!
नहीं टूट के बिखर सकतें हैं हम!!
ख़ुद पर भरोसा हैं हमें!!
अगर एक अंधेरा हूँ मैं तो उसमें " चमकता तारा " हूँ मैं!!
मैं अपने अंधेरों के आगे नहीं झुक सकती हूँ ...
कभी नहीं झुक सकती हूँ ....

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