एक विचार


आज तनिक अनमनी व्यथित हो
सोचा कैसा जीवन है यह?
रोज़ एक जैसी दिनचर्या !
न कुछ गति न ही कोई लय !!

इक विचार फिर कौंधा मन में
चलो किसी से बदली कर लें
कुछ दिन कौतूहल से भर लें ,
कुछ नवीन तो हम भी कर लें!

एक -एक कर सबको आँका
सबकी परिस्थिति को परखा
कुछ-कुछ सबमें आड़े आया
नहीं पात्र फिर कोई सुहाया !

कहीं बहुत एकाकीपन था
कहीं गुत्थियाँ थीं उलझन की
भरी कहीं केवल नीरसता
कहीं विषमता ही अतितर थी!!

सादा सरल अलोना व्यंजन
कब जिह्वा को रुचता है ?
एक ही रस यदि पसरा हो तो
कहाँ स्वाद फिर रमता है ?

'मधुर' पलों को अलग निकाला
'कटुता' को उनसे ढक डाला
छिड़क नमक 'चटपटे'क्षणों का
हुआ 'सुस्वादित' मेरा निवाला!!

Poem Rating:
Click To Rate This Poem!

Continue Rating Poems


Share This Poem



This Poems Story

यह कविता मैंने सबके विचारों को अपने जैसा ही समझ कर लिखी है