एक शिकायत


लो आज हम फिर वहीं हैं
ये महफिल भी वही है , समां भी वही है

असर है उनकी मुहब्बत का , मैं यहां हूँ
लेकिन रूह मेरी उनके पास है
शायद उसके कदमों के आहट से मेरी सांसों का रिश्ता बेहद खास है
सुरीली आवाजें तो अक्सर सुनता हूँ ,कानों को उसकी ख़ामोशी के मीठे स्वर की तलाश है
इस घनेरी रात में उस चमकते तारे से उसके संदेशे की आस है
असर है चाँद के मोहब्बत की , अब तो अंधेरा भी बहुत खास है
आज भी इस अजनबी दुनिया में उसकी तलाश है

जगह भी यही थी ,वक़्त भी यही था
नज़रे मिली थी ,चाहतें बेपर्दा हुई थी
मैं ग़ज़ल ,वो नज़्म लिए आई थी
वो कागज़ जिसपर लिखे अल्फ़ाज़ पढ़कर
उन्होंने पलकें अपनी झुकायी थी
उनके चेहरे पर वो दिलकश मुस्कान आयी थी
वो मुस्कान जो मुझे ,मुझसे ही छीन ले गई थी
बंदिशें ही कुछ ऐसी थी
नज़रों से उनका दूर होना , एक पल भी न मंज़ूर था
फासले मेरी बेबशी थी , किस्मत में उनकी जुदाई थी

मैं टूटा हज़ार बार था ,उनकी चाहत ने समेटे रखा था
दरार तो मुझमें कई पड़े ,लेकिन उन्होंने अपनी हाथों से सजाया था।
मेरी रूह भी खुदा से बगावत पर आयी थी
उन्हें पाने की आरज़ू इस क़दर छायी थी

कभी मेरी सुबह उनके दीदार से होती थी
आज हमें पलकें उठाने तक कि इज़ाज़त नहीं
उफ़!ये दुश्मनी उनकी उजाले से
आंखे मेरी बन्द होती है जब मेरे कंधे पर उनका सर
मेरी हाथों में उनका हाथ होता है

अधूरा साथ उनका लेकिन ये मुहब्बत बेपनाह उनकी
सात फेरे कभी अरमानों ने लिए थे
हम तो आज भी वो वायदे निभा रहे हैं
वो कसमें ,जो शब्दों से नहीं लिए थे।

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