ए जिंदगी !


लोग देखते हैं सिर्फ मेरी हँसी
सँभालने को कोई खास नहीं।
मैं किसी के लिए खास बनु
शायद,
मुझमें ऐसी कोई बात नहीं
सचमुच,
जीने की अब कोई आस नहीं ।
दोस्त यारों की महफ़िल नहीं भाँति
अब तो दोस्ती भी,
कुट-कुट कर रुलाती।
भीतर की सरिता को,
सबके सामने लाने, मैं हु लड़खड़ाती ।।
ज़रा अँधेरी रातों में झाँक के देखो,
हमारे तकिये गीले है,
अगर तुम्हारा चेहरा दिख जाए
बागों में कली खिले हैं ।
दिवानो का है कहना,
जितना है खोया, उतना है पाना।
मुनासिब नहीं मैं इन लकीरों के लिए,
मैंने तो दुर्भाग्यवश सिर्फ है खोया ।
ए जिंदगी ! मुझे बस इतना बता
मैंने तुझे जिया या
तुने मुझे जिया ।।

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