कलंक


*कलंक*

इश्क़ में तब अदब का मुकाम आता है|
निगाहों से जब कोई रूह में उतर जाता है|

गुनाहगार होते है दिल की दुनिया बसाने वाले..
ये ज़माना आशिकों से रश्क खाता है|

,कहते है वो देख, हमारे बेदाग नूरानी चेहरे को..
दागदार चाँद भी रूबरू हो ,हमसे शर्माता है|

,इश्क़, हुस्न औऱ नाम है तन्हाइयों का।
मशहूर रुसवाइयों का सिलसिला हो जाता है|

बेहिसाब अश्क़ बहते है| आँखों के कोरो से.
कलंक कुछ यूं काजल बन जाता है|

नवनीता कटकवार
बालाघाट

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