कविता


“आश्रय”

बहुत दिनों के बाद एक ‘आश्रय’ मिला था -
जीवन को आगे बढ़ाने के लिये
जब नयी-नयी कल्पना मन में आती रहती थी,
तब वो हमेशा नजर आती रहती थी ।

लेकिन आज वो भी कम-नजर आ रहा है -
जो महल एक दिन स्वप्नों से बनाया था;
आज जीवन की नदी पार करने के लिये
आज कोई किनारा नहीं दिखाई पड़ता

सिर्फ चारो तरफ समुंदर नजर आ रहा है ।
हर तरफ केवल ऊसर ही नजर आ रहा है
ज़िदगी तो मेरे साथ ही विताया था -
अब तो मौत ही हम-सफर नजर आ रहा है ।

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