कहाँ मालूम था


कशमकश में थी ज़िन्दगी मेरी, जब बारिशों को भीगने की प्यास थी।
ढलते सूरज को शाम की तलाश थी।
यकीन की कलम से
चाहतों के कागज़ पर
कहाँ मालूम था,
मोहब्बत ही लिखी होगी?
दरबदर था कैसा ये मंज़र था
जब गुज़रते लम्हों को लम्हें की चाहत थी,
अंधेरे को जब एक रात की आस थी।
बेसुध सी गलियों में
बेसब्र सी नज़रे होगी,
कहाँ तय हुआ?
झूठ के पर्दों पर
वफ़ा की कढ़ाई की होंगी।
टूटे हुए काँच पर रिश्तों का भाँवर था
जब नज़रों को नज़ारे देखने का शौक था,
और मौसम को बदलने का फ़ितूर था।
यादों की दीवार पर
जख्मों से दरार थी,
कहाँ मालूम था
दिलों की मरम्मत
कभी होंगी नहीं....

आराधना सिंह

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