किसान


वो किसान है
धरती माँ का वो संतान कहलाता है, ईश्वर का वरदान वो अन्न दाता,
सारा जग का पेट वो भरता है, फ़िर भी दो टूके रोटी के लिए यूं तरसता ।
फटी चट्टान को नया जीवन देता है, ज़मीन को भी सुनहरे रंगों से रंग देता
हाथ सदा है धूल मिट्टी से लिपे, पैरों में सदा कीचड़ के छीटे ।
है सुद्ध सदा हृदय उसका, करता कल्याण सारे जग के हित का,
भूख की ददकती आग को मिटाता है, मगर आज भी वो ईश्वर से बूंद बूंद जल का आस लगाता ।
संसार का है वो एक मात्र ज्वाला, भटकता फ़ीरता है वो आज भी कहीं भीषण भूख का मारा,
लहराती खेतों मे वो सोना उगाता, फ़िर भी वो दो जोड़े कपड़े की मोहताज रह जाता ।
हर दिन झुलसते आग में खुद को है वो झोंक देता, फ़िर क्यूँ हर रोज़ ईश्वर उसकी परीक्षा लेता ?
जहां सोते लोग अपना पेट भर के, वहाँ जगता किसान करता पहरेदारी खेत के ।
हर घर की रसोई में जहां खाने का मेला सजता, किसान के घर में वहाँ कुछ सुखी रोटियों से परिवार का पेट है भरता,
सर्द, गर्म, बरसात से हर पल जूझता है, और आखिर में वो सदेव हर जगह कमज़ोर कहलाता है ।
वो है फ़ौलाद इस धरती माँ का, मगर क्यूँ कहलाता आज भी अनपढ़, गरीब, कमज़ोर इस देश का ?
जहां चट्टान में हरियाली किसान की खून, पसीने की मेहनत लाती है, वहाँ लोग कहते हैं की उसकी शरीर से बदबू आती है !
डूबा है कहीं आज भी कर्ज़ के पैरों तले,घीरा है कहीं वो चिंता के माया चक्र में,
जब आया वो आगे मांगने अपना अधिकार, कर दिया निराश उसे सरकार ने करके राजनीति का प्रहार ।
बदली किस्मत हर व्यक्ति की, मगर कब बदलेगी किस्मत देश की किसान की?
अंत में निराश वो इस जग से हुआ, आत्म हत्या का मार्ग फ़िर उसने चुना,
उसे देख कर आज ईश्वर भी रोए, मगर कितने लोग उसकी मृत्यु पर रोए ?
सारे दुख, दर्द, गम सह कर भी वो बस चुप रह जाता है, एक वीर जवान है वो जो किसान कहलाता है ।

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