कृष्ण रात्रि


गिरि याम रवि प्रस्थान न करे,
भानु भान दीठ वारि सहज जलाए।
गिरिधर गिर गिर पुनि उठ जाऊँ,
दुष्ट उर जल पीर विलय कराए।

प्रतिक्षण मूर्त प्रणय जीवित करे,
अनायास पंचभूत खंडित हो जाए।
व्यग्र चित्त यामिनी में भ्रमण करे,
प्रेम क्षुधा प्रिय कैसे सुधा ही बुझाए।

अट्टहास मूढ़ मति मानस अधीर करे,
चंद्रिका छिटक चंद्र आप बलखाए।
घटा घट-घट श्याम घटक मुरारी,
घटना घटित कर प्रीत मन मुस्काए।

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