“घर रो रहा हैं”


न जाने यह क्या हो रहा है,
हर घर रो रहा है।
कुछ ना कुछ हो रहा है ,
शायद कुछ खो रहा है। ।

दिन होते हुए भी रात है,
आज शायद कुछ बात है।
यह तुमने क्या कर दिया है,
पाप का घड़ा भर दिया है।।

हर घर बन गया उड़ता हुआ काग है,
आज हर घर में आग है।
बहुत से लोग घरों में ही गैर है,
मुझे नहीं लगता अब घर बिखरने में देर है।।

आपस में ही तुम्हारे बैर है,
शायद एक इंसान कोई शेर है।
यह तुम्हारे दिल का फेर है,
क्यों आपस में ही तुम्हारे बैर है ।।

अब तो तु यह जान ले ,
मेरा कहना मान ले।
बंद कर दे तू यह मसले,
यह सारी बाते तू कसले।।

आज घर सारे फूट गए है,
रिश्ते सारे टूट गए है।
अब तो तु बातो का दहन करना ,
थोड़ा तो तू अब सहन करना।।

तुम्हारा घर तो बिखरा है,
यह तो सब को दिख रहा है।
यह तो एक कहानी है,
निखिल की तो यह जुबानी है।।।

ना हुई अभी भी देर है,
न तुम्हारे घर मे अंधेर हैं।
न जाने यह क्या हो रहा हैं,
हर घर रो रहा है।।

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