जब मेरा घर जलेगा तब तुम भी लिख देना।


जिस दिन मेरा घर जलेगा उस दिन राख पर बैठ कर मैं ही रोऊंगा।

आज तुम्हारा जला है, अखबार से पता चला, दुख मुझे भी हुआ या ना भी हुआ हो,
मगर अखबार में ही मैंने अपना दुख लिख दिया।

जीवन में थोड़ा व्यस्त हूँ और समय की पाबंदी भी है।
ऐसा करो आज उस राख के ढेर पे अकेले ही चीख चीख के रो लो।

जिस दिन मेरा जलेगा उस दिन तुम भी अखबार में लिख कर अपने सीने का बोझ हल्का कर लेना, जैसा मैंने किया है, करोगे ना?

हमलोग बुद्धजीवी लोग हैं कल्पना और वास्तविक्ता में अंतर खूब समझते हैं, ये जो जल रहा है कहीं दूर वो हमारे जीवन की सच्चाई थोड़ी है, ये तो बस एक अखबार है,

नही नही तुम गलत समझ रहे हो,अब भला अखबार पढ़ पढ़ कर इन कल्पनाओं को सच मान लें और दिनचर्या बदल दें ये तो होगा नही,
अब समाचार हमारी दिनचर्या थोड़ी बदल देंगे।

ऐसे घूर क्यों रहे हो? तुम मुझे दोषी समझते हो?
अरे भाई दोषियों के खिलाफ तो में भी हूं, तभी तो इतना लंबा लिख रहा हूँ,
अब इससे ज्यादा भला कोई कर भी क्या सकता है।

एक राज की बात बताऊं? अरे कई लोग तो अखबार में भी नही लिखते।
संवेदना ही नही है थोड़ी भी,
मगर मैंने लिखा ना, सो सुनो,
जिस दिन मेरा घर जलेगा ना, उस दिन तुम भी लिख देना। लिखोगे ना?

वैसे आजकल अखबार भी बहुत से हो गए हैं,
सो राय देना चिंता करना बहुत आसान है।
एक मिनट!
कहीं तुम ये तो नही सोच रहे कि इसीलिए सब लिखे जा रहे हैं।
अरे पागल हम सब सच में दुखी हैं।
बस एक गुज़ारिश है, जिस दिन हमारा घर जलेगा उस दिन तुम भी दुखी हो जाना, जैसे आज हम हैं।
बोलो हो जाओगे ना, जब अपने सपनों के राख पर बैठ हम रो रहे होंगे?

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