जीना चाहती है वो


जीना चाहती है वो...

नदियों सी अविरल धारा की तरह है वो,
बेसुध बेख़बर सी बहती रहती है वो,
ना जाने किस त्रासदी का शिकार हो जाए,
अनजाने डर में बेइंतहां सहमी रहती है वो,
चाहती है वो एकदम बेझिझक खुल के जीना,
पर मजबूर होकर सबकुछ सहती रहती है वो,
देखना है खुला आसमाँ उसको भी जी भर कर,
मग़र लोग क्या कहेंगे यही सोचती रहती है वो,
चाहती है झूमना मदमस्त बिना पाबंदी के,
टूटे कैसे वो बंदिशें यही सोचती रहती है वो,
खो ना दे वो अपने आप को इस अनजान सी जगह,
कोने में घर के इसीलिए डरी सहमी रहती है वो,
घूमना है खुले आकाश में बिना किसी खौफ़ के,
मग़र हर सुबह अख़बार में देखती रहती है वो,
कब आएगा वो दिन जब झूमेगी वो,
कब आएगा वो दिन जब घूमेगी वो,
उम्मीद की मशाल दिल मे जलाए बैठी है वो,
जीना है उसे भी ज़िन्दगी,
बस यही हमेशा कहती रहती है वो...

प्रतीक श्रीवास्तव
( Ig: @insane_jazbaat)

Poem Rating:
Click To Rate This Poem!

Continue Rating Poems


Share This Poem