दास्तान-ए-हिज्र


किसी को खोकर उसे चाहते रहना हर किसी की बात नही,
मेरी ग़म-ए-जुदाई हर कोई समझ ले ये किसी के बस की बात नही,
की मैंने उसे प्यार किया था
कोई हुक़ूमत नही जताई थी,
पर ये बात ख़ुदा को
या वालिद को
समझ नही आयी थी,
इसलिए कहता हूं !
की किसी को खोकर चाहते रहना हर किसी की बात नही।
मैं उसे दिल-ओ-जान से चाहा था
ये बात दुनिया को समझ नही आई थी,
सोचा कि उसे अगवा कर लू
अपनी चाहत की हुक़ूमत के लिए,
ये मेरा प्यार है कोई हवस का खेल नही,
सोचा की मेरे जुदाई के ग़म में मैं अकेले रो पड़ा था,
पीछे देखा तो हमारे हिज्र की तन्हाई में ख़ुदा रो रहा था
इसलिए कहता हूं ! कि
किसी को खोकर चाहते रहना हर किसी की बात नही
मेरी ग़म-ए-जुदाई हर कोई समझ ले ये किसी के बस की बात नही,
चलो ! ख़ैर हिज्र का गम मुझे अकेले उठाना था
पर कम्भख्त ये मौत न जाने कहा से आ बैठा था,
तेरी इस सावँली सूरत पर मरने को हर कोई तैयार था
पर मैं ही था जो इस सूरत के लिए तेरे साथ जीने के लिए तैयार था,
अब! मेरे तन्हाइयो में कोई साथ देने को तैयार नही
सोचे कि शराब की सहारा लेकर तुझे भुलाने की कोशिश करेंगे,
पर कम्भख्त ये शराब तेरी यादें को भुलाने को तैयार नही
कैसे? मैं अपने दिल को समझाऊ को तुम जा चुकी हो
पर! मेरा क़ल्ब इस बात को मानने को तैयार नही
अब कैसे अवाम को मेरे क़ल्ब की बात की!
किसी को खोकर उसे चाहते रहना हर किसी की बात नही,
मेरी ग़म-ए-जुदाई हर कोई समझ ले
ये किसी के बस की बात नही।

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मेरे प्यार की याद में