बचपन में हंसा करते थे जैसे,आज फिर से हंसते हैं।


बीच में ही टूट जाते हैं जो ,
वो सपने ही क्यूं होते हैं
हर बार जिन्हें हम चोट पहुंचाते हैं
अपने ही क्यूं होते हैं
किसी को गलत साबित करने के बाद
हम खुद ही क्यूं रोते हैं
हर मां- बाप पूरी करे हैं जो
वो हम बच्चों के ज़िद्द है क्यूं होते हैं
क्यूं हम किसी को
पाने से पहले खो देते हैं
क्यूं हम किसी के लिए
रात - रात भर रोते हैं
क्यूं हम किसी के दिल को
बेवजह ठेस पहुंचाते है
और क्यूं हम ऐसा कर के
अपना ही आत्म सम्मान खो देते हैं
नहीं हल होती हैं जब मुश्किलें
तो क्यूं हम किस्मत को दोष देते हैं
क्यूं हम खुद को नहीं समझाते
कि चलो एक बार और कोशिश करते हैं
चलो आज एक नई शुरुआत करते हैं
प्यारी सी इस ज़िंदगी को
मुस्कुरा कर जीते हैं
चलो आज फिर वो लम्हा याद करते हैं
बचपन में हंसा करते थे जैसे
आज फिर से हस्ते हैं।

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