बेटी


एक बेटी के मन से पूछो,
कितना कुछ है उसके मन के अन्दर |
फिर भी चुप रहती है वो,
क्योंकि ज़माने के पास उसके लिए है तानों का समन्दर ||

किसी से कुछ नहीं कहती,
बस मन ही मन रोती है |
सबके सामने तो हँसती रहती,
पर रातों में भी न सोती है ||

कहने को स्वतन्त्र है पर,
हर रोक -टोक सहती है वो |
सब दिखावे के लिए साथ हैं,
हमेशा तो अकेली रहती है वो ||

दूसरे घर जाना है तुझे,
सुन-सुनकर लगा कि,
थोडा प्यार उसे वहाँँ मिलेगा |
उसे क्या पता था वहाँ भी,
उसकी खुशियों का फूल न खिलेगा ||

सुन लो उसकी आवाज़ उसकी,
उसने तुम्हें पुकारा है |
मत करो उसे परेशान क्योंकि,
मुस्किल वक्त में वही देती तुम्हें साहारा है ||

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