भारतीय गरिमा


यह भक्त रक्त शक्त है ,असीम रश्मियाँ लिये ।
आदग्ध बाण रक्त की ,अनेक क्रांतिया लिये ।।
जो लेश के अशेष में , मजबूरियों के भेष में ।
विक्रांत शांत कर रहे ,वंचक हमारे देश में ।।

जो धर्म ग्रंथ नाम पर, जन्नत जेहन उतार कर ।
उलूक की मिसाल धर , हठधर्म अख्तियार कर ।।
सुख चैन कैसे पाओगे? निश्छल जनो को मारकर।
रे! मारकर अधिकार कर, इन्सानियत पे वार कर ।।

जो संतति यह भारती, अखंडता निहारती ।
विडम्बना कपूत रीत , बार-बार हारती ।।
आर्य-कार्य श्रेष्ठता के मानकों को नापती ।
कुकृत्य-लिप्त मानवों को देख-देख कांपती ।।

पाश्चात्य का असाध्य रोग सह सकेगी भारती ।
कर्तव्य-वैद्य की दवा अमर करेंगी भारती ।।
यह भक्त रक्त शक्त है ,असीम रश्मियाँ लिये ।
आदग्ध बाण रक्त की ,अनेक क्रांतिया लिये ।

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