भीख


उन दर दर हाथ फैलाने वालो पर
न जाने क्या गूजरी होगी.....
कुछ पल के लिए तुम्हें इंसानियत
पर हंसी तो आई होगी.....
उसकी मजबुरी का भी न जाने
किस किस ने मजाक बनाया होगा ........
कुछ ने तरस खाकर दो रोटी दी होगी
तो किसी ने दुतकारा होगा.....
तुम्हारे दिखावे के जहाँ मे न जाने वो
कितनी राते भूखा सोया होगा....
उन दर दर हाथ फैलाने वालो पर
न जाने क्या गूजरी होगी.....
हर कोई शौक से हाथ नही फैलाता
जरुर कोई तो मजबूरी रही होगी....

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इसके पीछे कोई खास कहानी नहीं,,,, पर किसी को किसी के आगे गिडगिडाता नही देख सकती,,, इस वजह से यह कविता लिखी,