मन को तो बस हिन्दी भाती


इस पावन अवसर पर मेरे मन में, बस एक बात है आती।
कुछ भी लिख लूं, कुछ भी पढ़ लूं, मन को तो बस हिंदी भाती।
हिन्दी भारत माँ की बिंदी, यह हमको जीना सिखलाती। प्यार बाँटती और डांटती, लोरी माँ हिंदी में गाती।
देख दशा हिंदी की प्रतिदिन, भारत माँ नर्वस हो जाती।
हिंदी है प्राणों से प्यारी, मन को तो बस हिंदी भाती।
आज जमाना कहां पहुंच गया, अंग्रेजी मन को ललचाती।
कहते सब सीखो अंग्रेजी, यह रोजी रोटी दिलवाती।
अंग्रेजी की करें प्रशंसा भले, समझ खुद इन्हें ना आती।
सारी भाषा आनी जानी, मन को तो बस हिंदी भाती।
जब गुस्सा बहुत तेज आ जाए, हिंदी ही उसे बयां कर पाती।
जब मन होता खाली खाली, हिंदी ही मन को समझाती।
अवधी,बघेली,बृज, बुंदेली, हम सबको यह एक बनाती।
हिंदी हमें करें एकजुट, एक साथ रहना सिखलाती।
............. मन को तो बस हिंदी भाती

बीरेंद्र ठाकुर पतलोनी दमोह (मध्य प्रदेश)

Poem Rating:
Click To Rate This Poem!

Continue Rating Poems


Share This Poem