माँ धरती


जय जननी माँ पुण्य धरा,
अनुपम तेरी परम्परा,
माँ तुझसा ना कोई दानी,
फिर भी जरा ना तू अभिमानी,
भूखे को माँ रोटी देती,
उगा फसल माँ खेती देती,
लाखों चेहरों की मुस्कान है तू ,
हे माँ वसुदा महान है तू ,
रूप तेरा माँ हरा भरा है,
लगता प्यारा माँ आँचल तेरा है,
लाखों बेटों के हैं गुड़ सुशोभित,
कभी ना हो कोई द्वेशीत,
जन्म से लेकर पालन पोषण,
सबकी माँ जिम्मेदारी तेरी,
अन्त तक माँ साथ तू देना,
फिर वापस माँ गोद तू लेना,
गाकर अपनी अद्भुत लोरी,
एक ही चंदा उसकी चकोरी,
गहरी नीद का सफ़र करा ना,
फिर आगे तू ही माँ धरती,
अपने पावन कर्तव्य निभाना।।
©️Ananyaraiparashar

Poem Rating:
Click To Rate This Poem!

Continue Rating Poems


Share This Poem