माँ


अगर तू न होती तो मेरा क्या होता ?
मै देर रात तक जागता और दोपहर तक सोता।
माँ तू अपने अंदर कितने राज़ छिपाती है,
तू हमको कभी अपने दुख नहीं बताती है।
अगर नहीं बचा हो तो तू खाना तक नहीं खाती।
फिर भी तू हमे कभी नहीं जताती।
अपने पसंद का खाना तू कभी नहीं बनाती।
हमारे पसंद के खाने मे ही तू खुश हो जाती।
बीमार होती है फिर भी करती है तू काम।
मगर चिंता करती अगर होता है मुझे थोड़ा सा जुखाम।
पाला पोसा, बड़ा किया, कि अब आ गयी मेरी मूँछ।
छोटा था तब बना रहता था तेरी पूँछ।
इच्छा है मेरी कि बड़ा होकर बदलू न मै कुछ।
तेरे किए एहसानों के सामने छोटा है सब कुछ।
माँ तूने किए है कितने परोपकार।
तेरे मुझ पे है कितने उपकार।
मैंने खाई तेरी कितनी डांट और मार।
आज पता चला की उसमे भी छिपे थे तेरी ममता और प्यार।
तू ही है मेरी आन बान और शान।
कैसे चुकाऊँ मैं तेरा एहसान।

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