मायाजाल


नादिया जैसे बहते बालो को
लगा दिया सँडसी रुपी बॉण्
हवा रूपी सन्यासी नहीं कर पाए स्नान
कही समझ न ले वह इसे अपना अपमान
अधूरा रह गया उनका खान और पान
यही बने वो कारण
जिनसे जुड़ा रहा द्रौपदी का मान -सम्मान
लाने वापस उसका आत्मसम्मान
लड़े वहां कौरव और पांडव
जो था धर्म का मैदान ।।

कहो इन्हें बाल या मायाजाल
यह है वही जिनके लिए
निकल गया रावण का राल
कलयुग में चाहे कर्दो इन्हें
नीला या लाल
यह वही है जो बन गए
खिलजी का काल
यह वही है जो बन गए
बाजीराव की शान
यह हो लंबे घने चाहे बीते दिन या साल ।।

इन्हें ही सजाकर सीताजी लाई वरमाल
जब ये ना हो सर पे तो दिखती है खाल
ये है वही बाल जिन्हें कलयुग में करदो नीला या लाल।।

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