मेरा बचपन


मेरा बचपन

आँखों में प्यारे सपने थे
दुनिया में सरे आपने थे
नाराजगी ना थी हम में
बस दो टॉफी में खुश हो जाते थे
जब मिटटी के खिलोने प्यारे थे
जब माँ - बाबा संग हमारे थे
जब सोते थे साँझ ढलते ही हम
और बोर हुए जग जाते थे
न भेद भाव की आहट थी
बस सब संग खेलने की चाहत थी
जब भाई संग धुल में खेला करते थे
देर घर जा कर माँ से डरते थे
जब हर गलती की माफ़ी थी
जब नादाँ सी गुस्ताखी थी
जब माँ से रूठ के रोना था
फिर उसी के अंचल में सोना था
जब दूध संग रोटी भाती थी
जब नानी-दादी कहानिया सुनती थी
जब मामा जी समोसे लाते थे
और हम सबसे ज्यादा खिलाते थे
जब पापा काँधे पर बिठा कर
मेला दिखाने ले कर जाते थे
जब जरा सी चोट लगने पर
घर पर बवाल मचता था
जब मेरी छोटी सी जीत पर
घर में त्यौहार सा मनता था
हाँ वो समय था मेरे बचपन का
उन मधुर सुरो के संगम का
जो लोट के अब ना आएगा
बस यादों में ही रह जाये गा

- लव जोशी

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poem is all about my childhood