मेरी पहचान!


मेरे अंदर की तूफ़ान बड़ी है,
आँखों में कोई लाज नहीं है,
मैं बदलते इन हालतो से जुझ रहा हूँ,
बड़ा दिल ले के भी मैं छोटा हो रहा हूँ,
अपनी ही जलती इस आग में मैं जल रहा हूँ,
क्यों मैं किताबों के पन्नों में खोज रहा हूं?,
या फिर मैं क्यों एक दरिया बन कर चल रहा हूं?,
कहने को तो पास हूं पर अभी मैं दूर हूं,
मचलते एक ज्वाला में मैं अपने आपको फूक रहा हूं,
अपने ही आप को दूसरों में ढूंढ रहा हूं,
कायर ना होकेे मैं अब भी कायरता में घुल रहा हूं,
मुसाफिर होकर भी मैं रुक चुका हूं,
अपनी ही आवाज को मैं परख रहा हूं,
मन मोहित होकर भी कुछ मोटाव् हो जा रहे हैं,
मैं अपनी ही शाखाओ मे भिठोल रहा हूँ,
कदम साफ होकर केे भी दोषी हो रहा है,
अब अच्छाइ से कालेपन में बदल रहा है,
यूँ तो मान का भी अब मेरा अपमान हो रहा है,
अब मैं अपने अतित में डूब रहा हूँ,
गंगा केे सागर में अब मैं स्वार्थी बनकर डूब रहा हूं,
सच और झूठ के फैसले में मैं अब ना समझ बनकर जी रहा हूं,
अब लोगो से अंजान बनकर जी रहा हूँ,
अब मैं एक भीरित्त की ज़िन्दगी जी रहा हूँ,
क्या करूँ अपने आप को बदल रहा हूँ,
उजाले में भी अब अंधेरा देख रहा हूं,
बंद दरवाजे केे पीछे अब मैं घुट रहा हूं,
खुद की आवाज़ को भूल रहा हूँ,
आँखों में नमी ले कर चल रहा हूँ,
अब हो चुका हूँ तंग इन हसीन चेहरो केे पापी कर्मों से,
मेरे ज़हन की हसी खो चुकी है बदलते इन हालातो से,
तड़पन की तड़पन में तड़प रहा हूँ,
शायर की शायरी से लिख रहा हूँ,
निचे गिर कर अभी खड़ा हूँ,
अपने ही पैएगाम में अपनो से लड़ रहा हूँ,
आसमान की छत से अभी नीचे गिरा हूँ,
अपनी ही शराफत में मदिरा पी कर झूम रहा हूँ,
घडी के कटो पर पुराने साये को ढूंढ रहा हूँ,
जज्बाती बनकर अपने आप से मुँह छुपा रहा हूँ,
ज़िंदा होकर भी चुप चाप सब कुछ सेह रहा हूँ,
बारिश केे आंसुओं में अपने आंसू को पिरों रहा हूं,
अपने ही काली छाया का साथ लेकर चल रहा हूं,
मेरी सोच यह सोच कर थक चुकी है,
कि हम सफर की इस महफिल में मैं अकेला ही चल रहा हूं,
मैं जग केे इस भार को अपने कंधों पर लिए घूम रहा हूं,
एक पल की खुशी में दो की खुशी ढूंढ रहा हूं,
मैं सब का दुश्मन बन कर जी रहा हूँ,
उठाने का नहीं है कोई सहारा फरेबी बनकर जी रहा हूँ,
अपनी ही तलाश में निकला था अपने आप को ही खोज रहा हूँ,
शायद इस लिए अपनी जिम्मेदारियों से पीछे जा रहा हूं,
शायद इस लिए कायरता की चादर ओढ़ कर हमेशा के लिए सो रहा हूं|

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