मेरी ज़िन्दगी


खड़े होकर सुने सड़क को देखता हूं
बेजान पेड़ के सूखे पत्तों को देखता हूं
फिक्र होती है कि अब आगे क्या होगा
मैं खुद में एक हारे हुए सिकंदर को देखता हूँ
•••
गुजरता वक्त जिंदगी बढ़ाता जा रहा है
उम्मीद की रोशनी घटाता जा रहा है
आग लगी थी सीने में कुछ कर दिखाने की
ये वक्त उस आग को बुझाता जा रहा है
•••
नाकाम हुए हम कुछ कमा न सके
अपना सिक्का जमाने में जमा ना सके
खुद की जिंदगी में उलझ गए हम
कोई रिश्ता सही से निभा ना सके
•••
न पिता को दे सका न भाई को कुछ दिया
न बहन न अपने मां को कुछ दिया
अब तो मेरा दिल मुझसे हीं पूछता है
कि बता तूने अपनी जिंदगी में क्या किया
•••
जिंदगी जी ली मैंने अब मरना चाहता हूं
तुम सब से बस इतना कहना चाहता हूं
मेरे मरने पर दो आंसू रो लेना
दो मिनट चुप रहना मुझे अपना कह लेना
•••
अब कब्र से ही अपने शहर को देखता हूं
जहां रहता था मैं उस घर को देखता हूं
दीवार पर मेरी तस्वीर लगी है
खुद को खुद की नजर से देखता हूं
मैं एक हारे हुए सिकंदर को देखता हूं
【धीरज】

Poem Rating:
Click To Rate This Poem!

Continue Rating Poems


Share This Poem