वर्तमान का गुणगान


भारत की आज़ादी का ऐलान यहाँ मैं करता हूं सदियों से पाली जागीर का दान यहाँ मैं करता हूं |
बहुत हुआ यह कहर तुम्हारा बहुत हुई मनमानी है
खूब लड़ेंगे हम भी क्योंकि हम भी हिंदुस्तानी हैं |
पीठ के पीछे बातें करके मुख पर तुम हंस लेते हो,
झूठ बोलकर अपने ही दिल को क्यों धोखा देते हो,
क्यों तुम हिंदुस्तान की रक्षा का झूठा प्रण लेते हो ,
एक ही पल में ब्रेकअप दूजी से पैचअप कर लेते हो,
माथे पर तुम तिलक लगाकर राम भक्त हो जाते हो,
मस्तक पर चंदन मलकर ढोंगी पंडित हो जाते हो,
पैर को छूना प्रथा बनाकर अत्याचार बढ़ाते हो, आडंबर का साथ निभाकर खुद को श्रेष्ठ बताते हो |
तुम कहते गुजरती हूं मैं और मैं राजस्थानी हूं , क्यों ना कहते देशभक्त हूं और मैं हिंदुस्तानी हूँ आँखें मेरी गलत देखकर सहन नहीं कर पाती है ,
एक ही पल में तीव्र गति से अंगारा बन जाती है | निंदा मरी कितनी कर लो पीछे नह हटूंगा मैं , बात समझ लो एक बार में फिर से नहीं कहूंगा मैं |
नज़र लग गयी देश को शायद आज राहते चंद नहीं,
कलह द्वेष ही फैला जग में कही भी तो आनंद नहीं |
देश में बेरोजगार युवा है दर-दर ठोकर खाते है , जानवरो का राजयोग है कुत्ते कार में जाते हैं | अभिलाषा ये मरी है इंसानो का भी ध्यान रखो, मिल- जलुकर सब साथ रहो, भारत मां का गुणगान करो |
- उमेश पंसारी

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