विकास


विकास के किस पथ पर
यह देश अपना चल पड़ा
अंतहीन इन सड़कों को पैदल
नापने की जिद पर अड़ा

लाचार कितने लोग वो
बच्चों को सिर पे ढो रहे
पैरों में पड़ गए छाले हैं
हिम्मत ना अपनी खो रहे

ताले लगे हैं किस्मत पर
छिन गई इनकी कमाई है
कितने तो घर ना पहुंच सके
रास्तों में जान गँवाई हैं

सारे नहीं यहां दोषी हैं
उनको सजा किस बात की
गरीब होकर जन्म लेना
ना बात इनके हाथ की

हो सकता है सब ठीक हो
यह दृश्य बड़ा डराते हैं
हम कितनी तरक्की कर चुके
सच्चाई हमें दिखाते हैं

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