“वो भी चाँद, मैं भी सूर्य”


वो भी चांद सा था, पर चांद जैसी कोई बात नहीं थी उसमे।
ज्वालामुखी जैसी उसकी आंखें थी और बाते कोहिले जैसी।
वो जलता गया पर जलाता मुझे गया।
मैं भी सूर्य सी थी, पर सूर्य जैसी कोई
बात नहीं थी मुझ मैं।
शीतल जल जैसी मेरी आंखें थी और बाते बर्फ जैसी।
वो मुझे पिघलाता गया, मैं पानी बनती गई।
ये तो नाम हैं हमारे एक दूसरे से अलग ।
अब दुनिया भी अलग सी बन गई हमारी।

उस चांद पर भी दाग था और इस सूर्य की आग तेज़ थी।
कोन किसको जलारा था या कोन किसको पिघलरा था।
ना वो कुछ बोल पा रहै थे, ना जाता पा रहै थे।
बस महसुस कर पा रहै थे वो जलना और पिघ लना॥
-रश्मि पंवार

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