ज़िंदगी का सफर


ज़िंदगी का सफर
- मोहम्मद उजैब

ज़िंदगी……
एक लंबा सफर है
रोज़ चलते रहना होगा
बिना थके, रुके
इस ज़िंदगी को जीना होगा

मुश्किलों का सामना तो होता रहेगा
यदि सलामती चाहते हो तो लड़ना पड़ेगा
ये एक जंग है बंधू, ज़ख्म तो होंगे ही
उन्हें नज़र अंदाज़ कर के आगे बढ़ना होगा

ज़िंदगी एक जंगल है परेशानी तो होगी
सही राह पर चलते रहो जीत तुम्हारी ही होगी
ऐसे न रो बंधू, तुम्हे यह सहना होगा
परेशानी को नज़र अंदाज़ करके तुम्हे आगे बढ़ना होगा

दुःख भी मिलता है, खुशियां भी मिलती है
यह दोनों साये की तरह ज़िंदगी भर साथ चलती है
एक दिन रात ढलेगी, उजाले का बसेरा होगा
बंधू आज उदास हो ! कल चेहरा खुशियों से भरा होगा

गलतियां तो होंगी तुम्हे ही सुधारनी होगी
ज़िंदगी बहुत छोटी है तुम्हे बड़ी बनानी होगी
यह अभी बेरंग है, बेढंग है
ज़िंदगी तुम्हे ही सवारनी होगी

काम बहुत बड़े बड़े है, मेहनत करनी होगी
फिर क्या बंधू ! मंज़िल तुम्हारे सामने होगी
किसी से नाराज़ न होना, न गुस्सा करना
बस परिश्रम के बल से मंज़िल की ओर बढ़ते रहना

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This Poem Tells about Truth of Life, Various Instance Which can be happened. This Poem Tells that how a Human is Living his/her Life.