ज़िंदगी की रेस


ज़िन्दगी की रेस को में
कभी समझ नही पाया ।
सोचा था दौडूंगा ,
लेकिन समय के हाथ मे सिर्फ में ही आया
बैठा था यूँ ही ,
अपने शामियाने में ,
कुछ पुराने ख्याल सोचकर
अपने माज़ी को याद करके
घुट घुट कर जी के
मर मर कर जी के
कभी इनके पहलू से
बाहर ही नही आ पाया
ज़िंदगी की रेस को में
कभी समझ नही पाया ।।
लोग चाँद तक पहुच रहे थे , और में चार कदम
चलने में भी इतरा रहा था ।
लोग बना रहै थे अपना घर रेत से और
रेत मेरा गुज़रता वक्क्त बता रहा था ।

ज़िंदगी की रेस को में कभी समझ नही पाया ।।।।।।

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