ज़िन्दगी का चित्र बना कर उसमे रंग क्यों भर ना पाया?


ज़िन्दगी का चित्र बना कर उसमे रंग क्यों भर ना पाया?

क्यों रौंद कर कलियों को तुमने रास्ता अपना बनाया?
क्यों छीन कर पैसे मुफ़लिसों के आशियाँ अपना सझाया?
तु चल रहा ऐसे मुसाफिर ये जहाँ तुमने बनाया,
तु ना समझा ज़िन्दगी को जिसका मूल रंग तूने सझाया,
ज़िन्दगी का चित्र बना कर उसमे रंग क्यों भर ना पाया?

घिस कर क़िस्मत को अपनी क्यों तुने ख़ुद को रुलाया?
ज़िल्लत भरी इस ज़िन्दगी को ख़ुशियों से तु भर ना पाया,
थम गए लम्हे वो सारे जिसपे तु ख़ुद चल ना पाया,
क्यों दोष देता दूसरों को पैरों से जब तु उठ ना पाया?
ज़िन्दगी का चित्र बना कर उसमे रंग तु भर ना पाया,

चिर कर धरती का सीना मणि-रत्नो को तुमने लुटाया,
तु टिक ना पाया सामने जब भूमि ने ख़ुद को हिलाया,
आसमाँ में उड़ कर तु बादलों को तोड़ आया,
जी ना पाया तु यहाँ जब बादलों ने जल ना गिराया,
ज़िन्दगी का चित्र बना कर उसमे रंग क्यों भर ना पाया?

ऊँची ऊँची मंज़िलों से रुतबा तुने ख़ुद का बढ़ाया,
काट कर पेड़ो को तुमने अपने ही पैरों को जलाया,
रात की नींदें उड़ा कर दिन का मंज़र जी ना पाया,
ज़िन्दगी जीते हुए भी उसमे तु ज़िंदा रह ना पाया,
ज़िन्दगी का चित्र बना कर उसमे रंग क्यों भर ना पाया?

उम्मीदों के पेड़ को इतना ऊपर तुने उठाया,
लाख़ कोशिशें की तुने किन्तु मंज़िल छू ना पाया,
रिश्वत चढ़ा कर मंदिरों में तु ख़ुदा को पाने आया,
कर्मा तुने ख़ुद बनाये वो तो हांसिल कर ना पाया,
ज़िन्दगी का चित्र बना कर उसमे रंग तु भर ना पाया.

तु ना समझा क्यों ना समझा तुने ही ख़ुद को भुलाया,
ज़िन्दगी की मंज़िल है तेरी पंथ भी तुने बनाया.

तु ही ख़ुद का देवता है तुने ही दानव बनाया,
सोच कर जो जीना चाहे रब ने क्यों तुझको बनाया,
मतलबी होकर क्यों तुने संहार से जीवन चलाया?
जो करेगा वो भरेगा उससे कोई बच ना पाया,
ज़िन्दगी की मंज़िल है तेरी पंथ भी तुने बनाया,

उम्मीद का दीपक सझा था एक झौके ने बुझाया,
रुक गया तु राहों में उसको बहाना क्यों बनाया?
तारे सारे गा रहे और आसमाँ ने चंदा सझाया,
चाँदनी रातों में देखो रास्ता भी चलने आया,
ज़िन्दगी की मंज़िल है तेरी पंथ भी तुने बनाया,

मंज़िल को देखा दूर तो राहों को तुमने क्यों भुलाया?
कंटक चुभा जो पैर में तो वीरता को क्यों गवांया?
झुक गया जो आसमाँ तो फिर से ऊँचा उठ ना पाया,
इसलिए रेहता ऊपर ही जो कभी ना डगमगाया,
ज़िन्दगी की मंज़िल है तेरी पंथ भी तुने बनाया,

किस्मत पे अपनी रख भरोसा उससे कितना भाग पाया,
धीरता का बाँध रख महावीर ने पर्बत हिलाया,
कर्मा करता हर घड़ी तु ना उससे पहले सोच पाया,
सोच ले तु दिल से अपने फिर कष्ट को क्यों सेह ना पाया?

तु ना समझा क्यों ना समझा तुने ही ख़ुद को भुलाया,
ज़िन्दगी की मंज़िल है तेरी पंथ भी तुने बनाया.

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