*।।।। मेरी माँ ।।।।*


आज भी उनकी ग़ोद में सिर रख़
चैन की निंद मुझे आती है ।।
ज़िंदगी में रोज़ मेरे वो ख़ुशियाँ भरती जाती है
और ख़ुदा के सामने मेरे लिए अपनी झोली भी फैलाती है ।।
प्यारी सी मेरी माँ वो केहलाती है ।।।।
इतना बड़ा हो गया हूँ आज
फिर भी बाबू मुझे वो बुलाती है ।।
ना जाने कितना प्यारा हूँ मैं उनके लिए
आज भी मुझे अपने हाथो से खाना वो खिलाती है ।।
और ज़रा सी चोट लगती मुझे
उनकी रूह काँप सी जाती है ।।
प्यारी सी मेरी माँ वो केहलाती है ।।।।
करता हूँ हज़ार नखऱे
फिर भी मेरे सारे नखऱे वो उठाती है ।।
मेरी सारी खताओ को
तुरंत भूल वो जाती है ।।
मुझपे अपना अनोखा़ प्यार वो बरसाती है
और क़दमो को देख उनके जन्नत मुझे नज़र आ जाती है ।।
ख़ुबसुरत सी प्यारी सी मेरी माँ वो केहलाती है ।।।।

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