Apna alag Sama hai alag hai ye karvan


ऐ मुसाफ़िर किस दौड़ मे तू हैं चल दिया
अपना अलग समां हैं अलग है ये कारवां

जहां सूरज,मिट्टी,हवा भी चलते है अपनी ही दिशा
तू क्यों चला हैं चलने, किसी और के निशाँ
अपना अलग समां हैं अलग हैं ये कारवां

जहां हर कोई लेकर आया अपना वज़ूद हैं
तेरी हर सांस ही उस वजूद का सबूत हैं
भेजा खुदा ने है तुझे तो कुछ खास तेरा रूप है
हर इंसान के रूप मैं एक खुदा ही तो मौज़ूद हैं

फिर क्यों रुकता नहीं ये नफ़रतो का सिलसिला
अपना अलग समां है अलग हैं ये कारवां

जहां हर सफर अलग,अलग है हर एक मुक़ाम
क्यों ढूंढे किसी और के सफर मे तेरी खामोशियां
बना होगा तू जिस जहाँ के लिए निकलेगी तेरी आवाज़ वहाँ
अपना अलग समां हैं अलग हैं ये कारवां

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