Beti hoon main


मौत आई है मुझे कई बार ।। एक बार नहीं सौ बार।।
कभी मारा मुझे सामाज ने। तो कभी उन्हीं के रिवाज ने।।
कभी मरी हूं मैं दहेज के जहर से, तो जली कभी उसी के कहर से।
" बाप " ने कभी दुनीया दिखा के मारा । तो कभी मारा मां की कोख में।।
आड़ ली मौत ने कभी मर्दानगी की ,
तो छुपी कभी एक तरफा चाहत की चादर में।
जिंदा रहकर भी मरी हूं मैं यारो,
जब बनी थी शीकार किसी की हवस की । जलाया गया कभी मुझे सती बनाकर,
तो मौत गई मुझे कभी निरभया बनाकर।।
मरी उस पल भी थी ,जब हर लया था चीर मेरा, और मरी उस पल भी जब बिक गया शरीर मेरा।।
मौत आई मेरी पहचान को भी,
मौत आई मेरी मुकान को भी,
और मौत आई मेरी उड़ान को भी।।
मौत आती रही ­, मैं मरती रही ।। वो मारती रही ­ और मैं सहती रही।।
पूछ लीया एक बार मैने मौत से की,
हर बार मरती मैं ही क्यों हूं??
जिंदा रहकर भी लाश बनी , मैं ही क्यों हूं??वो भी कह गई मुकुरा के­­" बेटी है तू" । " बेटी है तू"। " बेटी है तू" ।

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