Dekho dhartimaa ro rhi h


देखो धरती मां रो रही है
फिर से अपनी सुंदरता वापस पाने को।
देखो धरती मां तड़प रही है
फिर से अपनी हरियाली वापस पाने को।
जिस मानव को उसने जीवन दिया
उसी मानव ने उसका यह हाल किया।
देखो धरती मां रो रही है,.........

कभी रो रही है वो, बढ़ते धूल प्रदूषण से
कभी दूषित हो रहा है देह उसका, कूड़ा करकट से भरे नदी नहरो से।
कभी निराश हो बैठी है वो, बढ़ते प्लास्टिक के अत्याचारों से।
देखो धरती मां रो रही है.........।

सिर झुकाए आंखों में आंसू लिए करती अपनी दुखों का गान वो।
सिसक सिसक कर बिलक बिलक कर करती अपने अनुमान व्यक्त हो।
कभी प्राकृतिक आपदा कभी महामारी बढ़ाकर करती
कटी अपना आक्रोश व्यक्त हो।
कोई तो देगा ध्यान उस पर लगाए बैठी है ये आश वो।
देखो धरती मां रो रही है..........।

तो चलो एक आगाज करते हैं,
तो चलो एक आवाज करते हैं।
दिल से फिर एक फरियाद करते हैं।
उसकी सुंदरता को बरकरार रखने को।
कुछ पल और अपना इसके नाम करते हैं
इस प्रदूषण को दूर भगाने को
तो चलो फिर से एक कोशिश करते हैं
इसकी सुंदरता को और बढ़ाने को
तो चलो आज तो चलो आज आगाज करते हैं।
poonam gupta

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