Ek din baithe baithe yun hi soch raha tha mein


एक दिन बैठे बैठे यूं ही सोच रहा था मैं…
सोच रहा था की जिंदगी के किस मोड़ पर यूं खड़ा था मैं….
खुद से ही गिले, खुद से ही की शिकवे, खुद से ही मायूस होकर
आखिर किस सपने को पूरा करने की दौड़ में यूं लगा था मैं,
एक दिन बैठे बैठे यूं ही सोच रहा था मैं !!
वो सपना जिसमें दौलत तो है ,पर उसे खर्च करने का वक्त नहीं..
वो सपना दुनिया के सारे ऐश आराम तो देता है, पर मां की गोद नहीं..
वो सपना जो देखने में तो सुनहरा लगता है, लेकिन मुझको क्यों रास नहीं..
ऐसा सपना जो दुनियादारी तो समझता है, लेकिन जजबात नहीं ..
वो उड़ने नहीं देता…वो खेलने नहीं देता..वो हंसने नहीं देता..वो रोने नहीं देता.. देता है तो सिर्फ मायूसी,अधूरापन,
ऐसा अधूरापन जो शायद चांद की रोशनी को भी फीका कर दे..
ऐसा फीकापन ,जो मिठाई की मिठास को भी मिटा दे..
ऐसा सपना क्या मेरा सपना है? बस यूं ही बैठे-बैठे सोच रहा था मैं !!
कि पूछता हूं मैं दिल से, क्या यह तेरा सपना है?
जवाब मैं ख़ामोशी के अलावा दिल कुछ नहीं कहता..
और दिमाग तो जैसे रात के अंधेरे में गुम होकर, बस सुबह का इंतजार करता है..
वही सुबह जिसमें हंसी का मुखोटा पहनकर ,दफ्तर को जाना है..
वही दफ्तर जहां दिन का शाम बिताकर, लौट के घर को आना है
और रात के अंधेरे में फिर मायूस होकर बस यही सोचना है
कि आखिर जिंदगी की किस मोड़ पर खड़ा हूं मैं?
ये जिंदगी है? या जीने के नाम पर पल पल मर रहा हूं मैं..!!!

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