Ek karj


मै 2020 के इस ज़माने मै आज भी लड़की होने का कर्ज ढो रही हुँ
शायद तुम्हें ऐसा ना लगता हो, पर मैं आज भी मर रही हुँ

तुमने ना कभी माना था, ना माना है, ना मानोगे
तुम मर्द हो...
तुमसे आगे कोई औरत है, तुम कभी नही मानोगे

एक तरफ तुम उसकी मर्यादा की बात करते हो, और उसे धकेले जाते हो
तुम्हें अंदाजा भी नही, तुम उसे कितना बेबस करते जाते हो

अरे ! मै लड़की हूँ तो क्या, कब तक सहूँगी
मै भी एक जान हूँ, हमेशा मै ही क्यों मरूंगी

ये समाज दोषी है, ये भगवान दोषी है, बनावटे दोषी है
इसमें मेरा क्या दोष है, कि आफत हमेशा ही मुझ पर आएगी

थक चुकी हूँ मै इन जंजीरों से, तोड़ कर निकल आउंगी
एक दिन ऐसा आएगा, मै अकेले ही उड़ जाउंगी

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