Ishaq parinda


यायावरी ये इश्क़ परिंदा, कब बांधे बंधा है,
चाहिए इसे असीम आसमां, कब रोके रुका है।
पर इस जहां में, इस पर पहरेदारी बहुत हैं,
इश्क़ परिंदे के पीछे लगे शिकारी बहुत हैं।

जब भी किसी दिल की शाख पर जाकर बैठा है,
दुनियां के विषैले बाणों से छलनी हो जाता है।

इश्क़ परिंदा बैठा जब मेरे दिल के सरोरूह पर आकर,
छिपा लिया मैंने इसे दुनियां की नजरों से बचाकर।
बचाने को इसे बसा ली मैंने अपनी एक दुनिया न्यारी,
बसाकर अपनी तसव्वुर में मैंने हटा दी ये पहरेदारी।

पर कब तक रखूं इसे अपने तसव्वुर के जहां में,
कब बढ़ेगी अदब इसकी, इस दुनिया की निग़ाह में।

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