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सिलसिला ए जिंदगी के कुछ यूं चलने लगे,
बेखौफ मौत से मैं अब पैर हवा में उड़ने लगे।
रूह के छल्ले मेरे कुछ ऐसे हुए,
मुकम्मल मंजिल भी अब मुझसे डरे।

मैं आज भी वही हूं तकल्लुफ राहे ले रही हैं ,
पाक मेरे इरादे और नापाक फरिश्ते बरत रहे हैं।
कामयाबी के शिखर पर मैं,
वो हौसला-ए-बुलंद रही हूं।
रोकना ना मुझे तुम,
क्योंकि मैं अब मैदान-ए-जंग भी बनी हूं।

खामोश होकर कई अल्फाज़ बयां कर देती हूं ।
गिले मन के मेरे अब गले में ही रख लेती हूं।
फुर्सत में कभी आओ मेहमान नवाजी भी करूंगी,
आए अगर उंगली करने तो उंगली के साथ हाथ भी ना छोडूंगी।।

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