Manav Prachalan


हर घड़ी उसी घड़ी को ताकते,
आंखें गढ़ाए बैठे रहते थे आप, महोदय
आज क्या हुआ, ना घड़ी बदली, ना आप बदले
ओह! हां, आपके स्वार्थ बदले।

खंडर को रोशनदान में तब्दील तो कर दिया आपने,
पूरे जीवन का अच्छा सदुपयोग किया।
परन्तु आपके कुकर्म कहां जाएंगे,
वो उसी रोशनदान की रोशनी में जगमगाएंगे।

उस लकड़ी के चौखट को ताकते हुए महोदय,
कभी उसके पार भी झांक लिया करो।
बाहरी दुनिया के गमों के गट्ठरों को,
कभी अपने उल्लास से थोड़ा बांध भी लिया करो।

हस्तशिल्प उपकरणों का क्रय किया आपने, बहुत खूब,
परन्तु स्वयं को उपकार करने योग्य ना समझना।
अगर हैं आप इतने ही महान,
तो उन कृतियों के रचनाकार को नमन अवश्य करना।

कोरोना के रोग ने ऐसा दौर दिखाया,
हमें पिंजरे में कैद पंछी बनाया।
और, असंख्य मानवों के प्रेरकों को,
उन्हीं, कलाकारों को, स्वर्गवासी बनाया।

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