Matrubhumi


कितना बड़ा फर्ज है उनका ,
कितना बड़ा कर्ज है उनका ,
जिन्होंने देश की मिटी को ,
अपने माथे का तिलक समझा l
माँ की दूध भी रोई ,
देख फर्ज बेटे का ,
चुकता कर गया है कर्ज,
यू लिपटे तिरंगे मे,
पत्नी की बिंदी और मेहदी ,
कुछ कहती है धीरे से ,
जरा देख मुझे भी ले,
लिपटा ले तिरंगे में।
मै करता हु नमन उनको ,
मै करता हु नमन उनको ,
जिन्हों ने देश की मिटी को ,
अपने माथे का तिलक समझा l

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