Mazdoor


ये बात अगर हम शुरु करे
तो खत्म कहाँ पे होगी ये

लाचार तो ये तब भी थे
लाचार तो है अब भी ये

कितनी इतिहासे लिखी गई
सौर्य वीर गाथाऐं भी
सत्ता धारी हाथो की

कठपुतली तो ये तब भी थे
कठपुतली तो है अब भी ये

लूट लिया था सोने की चिड़ियाँ
घुसपैठी अंग्रेज़ो ने.......

फिर से लूट लिया है हमको
घर में बैठे चोरो ने.......

बस लूट सके न लाचारी
ये काले अंधेरो में.......

सेक रहे थे रोटी अपनी
जिनके दर्द के चूल्हों पे

बेबस तो ये तब भी थे
बेबस तो है अब भी ये

कूट नीत की बेड़ी से
सिमटे ये तैखानो में

गए हुए थे गाँवो से जो
शहरो में कुछ पाने को

कुछ तो करते चौकीदारी
कुछ तो भार उठाने को

लौट चले है पाखी फिर से
अपने गाँव में जाने को

जिनके दम से लोग है चलते
जिनके आगे काम भी झुकते

सौ-सौ मील की दूरी को ये
पग-पग चल कर पार है करते

भूख प्यास से तड़प रहे ये
घर-घर जा कर भटक रहे ये

पेट में लगते आँगरो को
पानी पी कर गटक रहे ये

फिर भी आँखे भरी नही
फिर भी साँसे थमी नही

जिनके भी ये भार उठाए
वे आंहे अब तक भरे नही

छोड़-छाड़ कर सब कुछ ये
पैरो में लेकर छालों को

जो गए हुए थे गाँवो से
शहरो में कुछ पाने को

तड़प रहे है आज वही
दो वक़्त की रोटी खाने को

लौट चले है पाखी फिर से
जो अपने गाँव में जाने को

ये बात जहाँ से शुरु हुई
ख़त्म वही पे होगी ये

मजदूर तो ये तब भी थे
मजदूर तो है अब भी ये

शिवेंद्र जामवाल
लेखक

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