Mehboob se rusvai


उसी से मोहब्बत,उसी से रुसवाई
समझ नहीं आता ये किन चक्करों में पड़ा हूँ मैं ,
वो जाती जा रही हर रोज़ दूर मुझसे
मुझे साथ उसी का चाहिए इसी पर अड़ा हूँ मैं ,
एक तरफ यादों का शोर है तो दूसरी ओर है अकेलेपन की खामोशी
न जाने ये कैसे दोराहे पे खड़ा हूँ मैं ,
और मैं जिन्दा हूँ अब तक उसके जाने के बाद भी
समझ लो 'सुयश' अपने जज़्बातों से कितना लड़ा हूँ मैं...

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