Musafir-e-ishq


जिस पेड़ के नीचे बैठ कर तुम गुनगुनाया करते थे,
उसी पेड़ की डाली पर तोता- मैना शाम बिताने आया करते थे!
मुझे याद है कैसे हम - तुम एक दूजे को देख मस्काया करते थे।
मेरे घर की खिड़की के दरवाज़े उसकी एक टहनी से हाथ मिलाया करते थे,
जब रोज़ शाम को हम चाय लिए बरामदे में आ जाय करते थे।
तरह -तरह के गाने गाकर तब तुम मेरा मन बहलाया करते थे।
कुछ तो था जो बस शुरू हुआ था,
कैसे दूर -दूर होकर भी हम तुम पास रहा करते थे,
दोनों ही एक दूसरे के लिए खास रहा करते थे!
एक सच से हम - तुम अंजान थे,
श्याद दोनों ही नादान थे।
जो शुरू हुआ था ,उसे खत्म होना ही था।
मूसाफिरों को अपना अपना घर छोड़ना ही था,
एक ठिकाने को हम - तुम घर समझ बैठे थे,
छप्पर को घर की छत समझ बैठे थे।
अपने - अपने सफ़र पर हम - तुम चल दिए थे,
मगर उस पेड़ पर यादों के निशान कई थे।
सुना है अभी रहेतें हैं हम - तुम वहां, तोता - मैना की जुबानी वो पेड़ जब भी सुनाता है हमारी कहानी.....।
Pratima Pandey

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